मैं हूँ एकल नारी
(गुजरात में 22 लाख एकल महिलाऐं हैं। मानव सभ्यता के इतिहास में हम एकल महिलाओं को सुरक्षित और सम्मानित जीवन क्यों नहीं दे पाते ??..इसपर गौर करने की गुजारिश है यह कविता....)
स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढ़े ...
सब के पीछे मेरी बारी
नारी में ही अलग मैं "नारी"
मैं हूँ एकल नारी .....
यह कैसी पहचान ओढ़ रखी हैे?
विधवा, त्यक्ता, अपरिणीत...
अस्तित्व मेरा करना होगा
क्यों पुरुष-नाम से साबित...??
क्यों पुरुष की विधवा
क्यों पुरुष से त्यक्ता
क्यों पुरुष के बिना अधूरी ।
यह है एकल नारी.....
जीवन साथी जो गुजरे .....
तो मैं मेहंदी छोड़ूँ ?
रंगो से ...किरनो से,
लहरों से ..रिश्ता तोड़ूँ ....
न झुमका, न छल्ला, न पॉँव में झांझर
मेले से, जश्न से हो जाऊँ बाहर
खुलकर हँसने की भी नही आज़ादी
मैं न देखूँ मेरेे बच्चों की शादी ...
ऊपर से कहे की "किस्मत की मारी"
मैं हूँ एकल नारी......
चुड़ैल, डायन ...मुझे कहा ...
बच्चे की बीमारी ..किसी की मौत
सब का जिम्मा मुझे मिला...
मेरा घर, खेत- खलिहान
अपनों ने ही लूंट लिया
घर से बेघर होने की मेरी बारी
मैं हूँ एकल नारी ....
पिता ने मुझे दान में दिया....
साथी ने किया मेरा त्याग
"त्यक्ता" कहके समाज ने
मेरे से ही माँगा जवाब ....
अरे मैं कोई चीज न हूँ ...
जो बदलो तुम बारी बारी ..
मैं हूँ एकल नारी.....
अगर नहीं की मैंने शादी
तो भी है सभी को दिक्कत
शक की नजरें..टेढ़े चेहरे ...
ऊँगली उठाये ...करे जुर्रत
स्वतन्त्र बनूँ .तो कहे स्वच्छंद...
रीत- भात के फरमान जारी
मैं हूँ एकल नारी.....
बस करो अब यह सब
साँस लूँ मैं खुल के अब
तू भी मानव मैं भी मानव
तेरे मेरे में है इक रब
प्यार की नरमी, मदद का हाथ
सम्मान से जी लूँ...
गर समाज हो साथ ...
न हो बेबस... न बेचारी ...
भारत की कोई भी एकल नारी....
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