लेन - देन

 रात को छोड़कर जब गगन उड़ता है

भोर की पंखुड़ियों में तब जगह पाता है 

नदी की धारा का सागर से होता मिलन

ऊँचे, ठंडे पहाड़ियोंका जब हाथ छूट जाता है। 


ऊंचे दरख्तों का हवाओं से बातें करना 

होता है मुमकिन है जब  बीज गड जाता है 

धरती को भिगोकर अपनी प्यास बुझाना 

होता है संभव.. जब बूँद घर छोड़ आता है


बचपन का नटखट आंगन छोड़ कर देखो तो 

जीवन की बाँसुरीका सूर मन लुभाता है।

रेशमी लम्हात जब हथेली से फिसल जाएँ...

चंद झुर्रियों में तब जीवन सिमट जाता है


संसार को छोड़ जब मन निकल पड़ता है 

धारा का दूजा छोर छूकर मुक्ति पाता है।

एक हाथ से कुछ छोड़...दूजे हाथ वह पाए 

दस्तूर यह दुनियाका अब समझ में आता है। 


                                         पंक्ति

दिल