दिल

  

अपने हिस्से के पल में ठहर जाता है 

                 चुपके से यह दिल मेरा  कुछ कह जाता है


दिल के इक कोने में पनपी है ख्वाईश 

प्यार पाने और देने की है फरमाइश 

मुठ्ठी में चुराकर वह पल, उड़ जाता है...

               चुपके से यह दिल मेरा  कुछ कह जाता है 


फूलों के संग ओस भी खिली है आज

मेरे गीत पे मेरी धुन और मेरा साज

जीने की आस हर पल दे जाता है

           चुपके से यह दिल मेरा  कुछ कह जाता है 


अरे, मुद्दतों बाद हुई खिलने की चाह

आँखे खोल खुद से ही मिलने की चाह

 ख्वाब पुराने अब पल पल जी जाता है

                चुपके से यह दिल मेरा कुछ कह जाता है

                 चुपके से यह दिल मेरा कुछ कह जाता है


गीत सिर्फ गीत नहीं होते ।

 शब्दों में तुम्हें वह उलझाए रखते 

सुर ओर ताल से  तुम्हें सहलाते 

उनकी लगन में गर हो गए मगन 

अतीत के आंगन में खेलकर  वह आते 

          गीत सिर्फ गीत नहीं होते ।


कभी तुम बैठे हो उदास उदास 

कोई अपना भी न हों तुम्हारे पास

चुटकी भर खुशी लेके पहुंचेंगे  गीत 

दोस्त, हमराही,फरिश्ता या मीत

     जो तुम चाहो वही बन जाते 

     गीत सिर्फ गीत नही होते 


दिलों की दूरियों को यह करते है कम 

बाँटने चले आते खुशी हो या गम

प्यार उनका देख आँखे हो जाए नम 

जोश उनका देखकर चलने लगे कदम 

     बदलाव का बिगुल भी यही है बजाते 

            गीत सिर्फ गीत नही होते 


तो चलो इन गीतों से दोस्ती कर लें 

 रंग इनसे लेकर, सपनों में भर लें 

इनके आँखों देंखें आज और कल 

हर पल से हम खुशी को चुन लें 

   अनोखी एक ऐसी सौगात है लाते

    गीत सिर्फ गीत नहीं होते 


                      पंक्ति 


लेन - देन

 रात को छोड़कर जब गगन उड़ता है

भोर की पंखुड़ियों में तब जगह पाता है 

नदी की धारा का सागर से होता मिलन

ऊँचे, ठंडे पहाड़ियोंका जब हाथ छूट जाता है। 


ऊंचे दरख्तों का हवाओं से बातें करना 

होता है मुमकिन है जब  बीज गड जाता है 

धरती को भिगोकर अपनी प्यास बुझाना 

होता है संभव.. जब बूँद घर छोड़ आता है


बचपन का नटखट आंगन छोड़ कर देखो तो 

जीवन की बाँसुरीका सूर मन लुभाता है।

रेशमी लम्हात जब हथेली से फिसल जाएँ...

चंद झुर्रियों में तब जीवन सिमट जाता है


संसार को छोड़ जब मन निकल पड़ता है 

धारा का दूजा छोर छूकर मुक्ति पाता है।

एक हाथ से कुछ छोड़...दूजे हाथ वह पाए 

दस्तूर यह दुनियाका अब समझ में आता है। 


                                         पंक्ति

संकल्प

 मुश्किलों की ना फिक्र मुझे 

ईनसे टक्कर हर पल है 

उनके फितरत से वाबस्ता

जीनकी आहट हर पल है ।


     कभी काँटे बन राह के 

     या झांझर, पायल ही बनकर 

     मेरी उम्मीद और हसरत को, 

      वह रोक लगाये हर पल है।


सदियों से यह दीवारें

सिसकियां मेरी सुनकर 

मूंद आँख और मुँह भी सीकर

टकराती मुझसे हर पल है ।


     हर ठोकर से हम उभरेंगे

     तू हर मुमकिन कोशिश कर

     नहीं रुकेंगे.. नहीं झुकेंगे

     बुलंद हौसलें हर पल है।


                          पंक्ति

એવી એક જગ્યા ....

 એક એવી જગ્યા


માથે-ખભે બોજો લઈ

આ ચાલતાં સૌ માનવી  

શોધતાં જગ્યા એવી 

બેસવા હળવા થઈ 


        જોઈએ જગ્યા એવી 

        કેમ અહીં ? ન પૂછે કોઈ

        ના મન ખોલવાનું કહે 

        ના ભાર તોલવાનું કહે 


કોઈ શર્ત સામે ન મૂકે

વંટોળ સામે ના ઝૂકે 

વિશ્વાસથી વિશ્વાસ ની 

 ડોર જે પકડી શકે


      ખૂબ મોટું છે  જગત 

       આવી એક જગ્યા જડે? 

        લાગણીના તાંતણાથી 

        ખડગ સામે જે લડે? 


ના જીતનો હિસ્સો બનું

ના હારનો કિસ્સો બનું

દુઃખ ટાણે યાદ આવે 

બસ..એવી જગ્યા બનું

     ...બસ..એવી જગ્યા બનું  .........

 

                    પંક્તિ

बस यही गुजारिश ....

 कोई तवक्कु न हों ..बस यही आरजू थी ...

कुछ लम्हे सुकूँ के ...बस एक ही गुजारिश थी...


     जिंदगी की दौड़ में कहीं खो न जाये हौसलें 

     रूह और अल्फाज में,  कभी हो न जाये फांसले 

    वक्त को आगाह करूँ यह कब मेरी फरमाइश थी? 

    कुछ लम्हे सुकूँ के...बस यही गुजारिश थी ....


दिन के फिराक में ...रात ना मायूस हों

दास्ताँ और हकीकत से जल्द ही मानूस हों

हर आफत मगर जैसे वक्त-ए आजमाईश थी....

कुछ लम्हे सुकूँ के...बस यही गुजारिश थी ...


  दूसरों के गम जियें इसपे ना मलाल हों 

  हर रंग के भीतर खिलता गर  गुलाल हों

  दो धारा पर नीर एक हों....बस यही  गुंजाइश थी

  कुछ लम्हे सुकूँ के...बस यही गुजारिश थी ..


कोई तवक्कु न हों ..बस यही आरजू थी ...

कुछ लम्हे सुकूँ के ...बस यही गुजारिश थी...


                                    पंक्ति 

तवक्कु - ख्वाईश, अपेक्षा, 

मानूस - घुल मिल जाना

मलाल- पछतावा

મન....

 આ મન કેવી ચીજ છે

કાંઈ સમજાતું નહીં યાર ....

         આંખો વગર રડી શકે..

         પાંખો વગર ઉડી શકે 

         જોઈ શકે  દૃષ્ટિ વગર 

         જગતના પેલા પાર 

આ મન કેવી ચીજ છે

કાંઈ સમજાતું નહીં યાર ....

         

        શબ્દો વગર બોલી શકે 

        બોલ્યો શબ્દ ઝીલી શકે 

        એક પળ માં ભીની આંખો 

         બીજા પળે લાવે બહાર 

આ મન કેવી ચીજ છે

કાંઈ સમજાતું નહીં યાર ....


      કરતબ ઘણા કરી બતાવે 

      પગ વગર ફરી બતાવે 

     રૂ જેવું હલકું હલકું 

     ક્યારેક પથ્થર જેવો ભાર  

આ મન કેવી ચીજ છે

કાંઈ સમજાતું નહીં યાર ....

         

      આ જેટલું મોટું થાય 

      ભૂલો, અપરાધ સમાઈ જાય 

      આ જ્યારે ઊંચું થાય...

       એને કશું જ ન સમજાય 

       મક્કમ બની પહાડ ખોદે

      તોડી નાખે બંધન હજાર

આ મન કેવી ચીજ છે

કાંઈ સમજાતું નહીં યાર ....

दिल