भोर की ओर

 


जब अपने चले जाते है....

कहते है ..रोना नहीं ..
उनको बहुत दुःख होगा
पीड़ा लेकर उस रूह को 
सफ़र लंबा करना होगा

कहते है हाथ न पकड़ना 
वह जा नहीं पाएंगे 
जीवन के इस चक्र में
फिर जकड़े जायेंगे

कहते है हौसला रखो
इक दिन सबको जाना है
और जानेवाले सबको लेकिन 
लौटके फिर आना है

जन्म मृत्यु के गतिचक्र 
का भेद बुद्ध ने जाना था
भूत- भविष्य को भुलाकर 
उसने आज को पहचाना था

उतनी ज्ञानी तो न हूँ मैं 
की सुख दुःख से परे रहूँ 
दोनों को बस अपना लूँ मैं 
दोनों के साथ चले चलूँ....

जानेवाले की याद में 
जी भर कर मैं रो भी लूँ 
यादों का छोर लिए हाथ में 
मैं भोर की और चलूँ 
मैं भोर की और चलूँ

पंक्ति



હે. જીંદગી.....

 તારા આપેલા સુખને હું ચાહું

અને દુઃખથી દૂર ભાગી જાઉં ...

જીંદગી ..આવી તો કેવી રીતે જીવું?


તારા બંને મુઠ્ઠીમાં ભરાયેલી છે ..

અગણિત પળો...કેટકેટલી યાદો..

ખાટી-મીઠી, કડવી, ખારી..જૂની-નવી...

ગમતી.. અણગમતી...યાદો....

મીઠી યાદોની મુઠ્ઠી હું ખોલું..

અને બીજી મુઠ્ઠી ને પાછી ધકેલું...

જીંદગી આવી તો કેવી રીતે જીવું?


તારી સાથે નહીં તો યાદોની સાથે 

હરેક પળ ફરી માણવા દો ...

ક્યારેક હસવાની સાથે રડવાનું ગમે ....

એવી રમત સ્મૃતિઓમાં રમવા દો...

પ્રત્યેક દાવ પર શીખું કઈંક નવું

જીંદગી હું તને એવી રીતે જીવું....

मेरी कहानी...

 कभी मै बनके तुम....

मुझको देखो तो जानो...

सह गई हूँ मैं कीन....

घावों को अक्सर....


मैने हंसकर तेरा...

बोझ सारा लिया...

तुने जी भर जीया है...

मेरे हीस्से का बचपन...


मेरे पहले ही तेरी

बारी थी हर वक्त....

चाहे खाने की बात हों

या हो कोई खिलौना .....


कभी आसान ना थी....

यह मंजिल यह सफर....

होंसलों से...बुलंद की....

हर मुश्किल डगर.


अब मैं तुझसे बडी हूँ....

दुनिया से लडी हूँ.....

हर एक जगह मैं ....

पैर गड कर खडी हूँ....


सोच अब तुझे तो

बदलनी पडेगी.....

मेरी पहचान ही अब 

तुझसे भीडेगी....


पंक्ति

हुआ आज मैं गुंगा बहरा .....

तुने देखा क्या आज फिर,

गांधी बापु रोया था। 

अमीरों के शौख शान पर

गरीबोंको जब दफनाया था। 

                           

          

जब....

 जब कोई बात हो...

    और न कोई साथ हो...
   समय के साथ का ...
   साथ तू जोड़ लेना ...
           और फिर खड़े होना ....

     जब सवाल खड़े हों...
'जवाबों' से बड़े हों ....
जब "तू" और "तू" ही ...
आपस में लड़े हों ...
स्वयं की शक्ति को 
धैर्य से जोड़ लेना.. 
         और फिर खड़े होना ...

    जब प्रवाह की दिशा से 
    तेरी दिशा हो अलग
    न मन में हो शंका ..
   न हो तेरे पैर डग-मग 
       "तुझ से ही शुरू ....
         नई दिशा का है होना...."
                बन अटल .बन निडर 
          और फिर खड़े होना

पंक्ति .

જયારે જોવાનું હતું ..

 જયારે જોવાનું હતું...

ત્યારે મેં આંખ મીંચી 

ઝળહળતી રોશનીને 
બેઠો સપના વેંચી ...

       જયારે સાંભળવાનું હતું
      ત્યારે ભર્યું  કાનમાં રુ...
      ચીસા ચીસ ને બુમાબુમ 
      મને લાગ્યું કાવતરું

જયારે બોલવાનું હતું 
ત્યારે મોઢામાં ભર્યા મગ
મારુ શુ? મને શું? 
તેનાથી શું બદલાશે જગ?

     જયારે ભેગા ચાલવાનું હતું 
     ત્યારે ખુલ્લા જ હતા પગ 
     પણ આંખ, કાન ને મોઢા વગર
     ગુલામ શરીર ..ગુલામ મગજ...

પંક્તિ 

और मैंने एक दोस्त खो दिया ...

मेरे लिए इस संसार की सबसे खूबसूरत चीज है दोस्ती . लेकिन आज भी लड़की को इस नायाब तोहफे से महरूम रखा जाता है ....क्योंकि वह एक लड़की है....समाज के इस कोतेेपन को दर्शाती है यह कविता ..

एक दोस्त खो दिया ...

हाथ में हाथ डाले  
हम स्कूल जाते थे  ...
इमली, चॉकलेट पेपर मिंट
मिल बाँटकर खाते थे

कीचड़, पत्थर कच्चा रस्ता
पैर फिसले तो गिर जाए बस्ता
कभी तू मुझे तो मैं तुझे
गिरने पर संभालते थे...

ना तुम boy थे ना मैं थी girl
हम सिर्फ  दोस्त थे हर पल
फिर क्यों कहा इक दिन सब ने ?
तू लड़की है... अब तो संभल...?

झट से तेरा हाथ छूट गया
कुछ दूरी पर तू सिमट गया..
दोस्ती, यारी, हँसना ..रुठना..
लड़का लड़की में बंट गया...

मैंने एक दोस्त खो दिया.....

अरे घर पर भी तो यही हुआ
पहले नानी, चाची  और फिर बुआ
सयानी हो गई ...सलीका सिखना
अब तू पापा से न लिपटना..

और मैने एक दोस्त खो दिया  .

पापा के साथ भाई भी छूटा
मस्ती- मजाक सब बंद?  दिल पूरा टूटा
इस सयानेपन के आने से
मेरा बचपन ही मुझसे रूठा

मैंने एक औऱ दोस्त खो दिया...

दुनिया के दस्तूर से मैं बड़ी हो गई
खुद को संभलकर खड़ी हो गई...
फिर कॉलेज में प्यारा दोस्त मिला
उसके साथ में बचपन को फिर जिया

प्यारी सी दोस्ती थी और  दोस्ती में प्यार था
पर उसपर भी सवाल उठे ..जमाने का दस्तूर था
कौन है वो? तुझसे करेगा शादी?
लड़कियों के लिए अच्छी है क्या?
ऐसी छूट और इतनी आजादी ?

और मैने दोस्त खो दिया...

फिर शादी की, एक पति मिला
मैंने समझा चलो दोस्त मिला
वो मेरा.. मैं उसकी..हक्क से लड़ूंगी
कान खिचूँगी उसके...हँसी मजाक भी करूँगी

पर मेरा सोचना होना न था
पति को दोस्त बनना न था..
दोस्ती नाम का रिश्ता अब पराया सा है
शादी के बाद दोस्ती? एक गुनाह सा है.

पिता, भाई, पति और माता
क्यों चाहिए तुझे और कोई नाता?
मैने भी यह कानून मान लिया
लड़की को 'दोस्त' नहीं होता जान लिया

पंक्ति

स्वतंत्रता ....

(मेरे लिए)न्याय मांगने से पहले....
थोडासा यह भी गौर करो 
कतई नहीं बर्दाश्त मुझे
न्याय के नाम कुछ औऱ करो ...

अगर न्याय दिलाना  मुझे 
न्यायी  बनना पहले सीख
बेखौफ माहौल कैसे होगा
उस पर सोच... उस पर लिख

सदियों पुराने रीतीरिवाज
तोड़ने होंगे तुम्हे आज
दहलीज, घूंघट, परदा सब से 
परे है सम्मान की यह बात...

बहन, पत्नी को सुनना होगा 
हर निर्णय में लें वह हिस्सा
बोझ नही मैं, न हूँ अमानत 
जोक, मजाक ना मैं किस्सा

गली मोहल्ले में जब तू होगा
दोस्तों यारों के  संग, 
कोई लडक़ी, कोई औरत 
देखके तू बदल न रंग

"चीज" कहकर होश न गवाँना
यारों को भी तुम संभालना 
जिम्मा तेरा....डरे नहीं वह 
खुद को यह एहसास दिलाना

कभी बस, ट्रेन की सफर में 
नन्ही बच्ची लिए गोद में
दर्द में कराहती दिखेगी
बच्चे को संजोए कोख में

झट से उठ जगह तू दे 
राह न देख किसी और की,
मैं ही क्यों, पल भर न सोच, 
समझ ले तूने इबादत की, 

तेरे दफ्तरों में भी दिखेंगे 
लोग तरह तरह के 
पास जाकर,  छूते होंगे 
काम के बहाने से

देखकर यह अनदेख न कर
उठ खड़ा हो,पकड़ हाथ 
वह सहमी डरी दिखे अगर 
लड़ने में दो उसका साथ

अगर तेरे से वह आगे जाए 
हुनर उसका चमके निखरे 
जलन, ईर्ष्या तुझे न हों
खुलेपन से हार मान ले

हर  वह चिन्ह मिटाने होंगे
जो बताएँ उसको अबला
सृजनहार है नारी जग की,  
निडर, निर्भय वह तो सबला....

हर पुरुष, सिर्फ पुरुष न होकर...
इंसान बने गर जिम्मेदार 
बेखौफ माहौल यहाँ होगा और 
न्यायी होगा यह संसार

(महिलाओं के प्रति हो रहे अन्याय के लिए सिर्फ पुरुष जिम्मेदार नहीं है, पर वह मानसिकता जिम्मेदार है जो हर जगह दिखती है, महिलाओं में भी...)

पंक्ति

दिल