कोई तवक्कु न हों ..बस यही आरजू थी ...
कुछ लम्हे सुकूँ के ...बस एक ही गुजारिश थी...
जिंदगी की दौड़ में कहीं खो न जाये हौसलें
रूह और अल्फाज में, कभी हो न जाये फांसले
वक्त को आगाह करूँ यह कब मेरी फरमाइश थी?
कुछ लम्हे सुकूँ के...बस यही गुजारिश थी ....
दिन के फिराक में ...रात ना मायूस हों
दास्ताँ और हकीकत से जल्द ही मानूस हों
हर आफत मगर जैसे वक्त-ए आजमाईश थी....
कुछ लम्हे सुकूँ के...बस यही गुजारिश थी ...
दूसरों के गम जियें इसपे ना मलाल हों
हर रंग के भीतर खिलता गर गुलाल हों
दो धारा पर नीर एक हों....बस यही गुंजाइश थी
कुछ लम्हे सुकूँ के...बस यही गुजारिश थी ..
कोई तवक्कु न हों ..बस यही आरजू थी ...
कुछ लम्हे सुकूँ के ...बस यही गुजारिश थी...
पंक्ति
तवक्कु - ख्वाईश, अपेक्षा,
मानूस - घुल मिल जाना
मलाल- पछतावा
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