स्वतंत्रता ....

(मेरे लिए)न्याय मांगने से पहले....
थोडासा यह भी गौर करो 
कतई नहीं बर्दाश्त मुझे
न्याय के नाम कुछ औऱ करो ...

अगर न्याय दिलाना  मुझे 
न्यायी  बनना पहले सीख
बेखौफ माहौल कैसे होगा
उस पर सोच... उस पर लिख

सदियों पुराने रीतीरिवाज
तोड़ने होंगे तुम्हे आज
दहलीज, घूंघट, परदा सब से 
परे है सम्मान की यह बात...

बहन, पत्नी को सुनना होगा 
हर निर्णय में लें वह हिस्सा
बोझ नही मैं, न हूँ अमानत 
जोक, मजाक ना मैं किस्सा

गली मोहल्ले में जब तू होगा
दोस्तों यारों के  संग, 
कोई लडक़ी, कोई औरत 
देखके तू बदल न रंग

"चीज" कहकर होश न गवाँना
यारों को भी तुम संभालना 
जिम्मा तेरा....डरे नहीं वह 
खुद को यह एहसास दिलाना

कभी बस, ट्रेन की सफर में 
नन्ही बच्ची लिए गोद में
दर्द में कराहती दिखेगी
बच्चे को संजोए कोख में

झट से उठ जगह तू दे 
राह न देख किसी और की,
मैं ही क्यों, पल भर न सोच, 
समझ ले तूने इबादत की, 

तेरे दफ्तरों में भी दिखेंगे 
लोग तरह तरह के 
पास जाकर,  छूते होंगे 
काम के बहाने से

देखकर यह अनदेख न कर
उठ खड़ा हो,पकड़ हाथ 
वह सहमी डरी दिखे अगर 
लड़ने में दो उसका साथ

अगर तेरे से वह आगे जाए 
हुनर उसका चमके निखरे 
जलन, ईर्ष्या तुझे न हों
खुलेपन से हार मान ले

हर  वह चिन्ह मिटाने होंगे
जो बताएँ उसको अबला
सृजनहार है नारी जग की,  
निडर, निर्भय वह तो सबला....

हर पुरुष, सिर्फ पुरुष न होकर...
इंसान बने गर जिम्मेदार 
बेखौफ माहौल यहाँ होगा और 
न्यायी होगा यह संसार

(महिलाओं के प्रति हो रहे अन्याय के लिए सिर्फ पुरुष जिम्मेदार नहीं है, पर वह मानसिकता जिम्मेदार है जो हर जगह दिखती है, महिलाओं में भी...)

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दिल