भोर की ओर

 


जब अपने चले जाते है....

कहते है ..रोना नहीं ..
उनको बहुत दुःख होगा
पीड़ा लेकर उस रूह को 
सफ़र लंबा करना होगा

कहते है हाथ न पकड़ना 
वह जा नहीं पाएंगे 
जीवन के इस चक्र में
फिर जकड़े जायेंगे

कहते है हौसला रखो
इक दिन सबको जाना है
और जानेवाले सबको लेकिन 
लौटके फिर आना है

जन्म मृत्यु के गतिचक्र 
का भेद बुद्ध ने जाना था
भूत- भविष्य को भुलाकर 
उसने आज को पहचाना था

उतनी ज्ञानी तो न हूँ मैं 
की सुख दुःख से परे रहूँ 
दोनों को बस अपना लूँ मैं 
दोनों के साथ चले चलूँ....

जानेवाले की याद में 
जी भर कर मैं रो भी लूँ 
यादों का छोर लिए हाथ में 
मैं भोर की और चलूँ 
मैं भोर की और चलूँ

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दिल